67 साल हो गए…लेकिन Laika की कहानी आज भीदिल को भारी कर देती है।वो कोई वैज्ञानिक नहीं थी,कोई सैनिक नहीं थी,वो बस एक आवारा कुतिया थीजिसने इंसानों पर भरोसा किया।भोजन था…पानी था…तकनीक थी…लेकिन घर लौटने की कोई योजना नहीं थी।Laika ने इतिहास नहीं चुना,उसे इतिहास बना दिया गया।आज जब हम तरक़्क़ी पर तालियाँ बजाते हैं,तो एक सवाल अब भी ज़िंदा है —क्या प्रगति, करुणा से ज़्यादा बड़ी हो सकती है?अगर आपको लगता हैकि तरक़्क़ी बिना दया के अधूरी है,। तो अपना मत दीजिए क्या ये सही था।
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