शरीर से मांस का एक-एक कतरा गल चुका था। पसलियां बाहर आ गई थीं। हिलने-डुलने तक की ताकत नहीं बची थी जब अंग्रेजों ने देखा कि यह 25 साल का लड़का टूट नहीं रहा, तो उन्होंने जबरदस्ती नाक में नली ठूंसकर दूध पिलाने की कोशिश की। वह नली खाने की नली की जगह फेफड़ों में चली गई।🔸️दूध फेफड़ों में भर गया। वो तड़पते रहे, खून की उल्टियां करते रहे, लेकिन अनशन नहीं तोड़ा। 13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल में एक क्रांतिकारी ने अपने प्राण त्याग दिए। 63 दिन… जी हाँ, 63 दिन तक बिना अन्न का एक दाना खाए।🔹️इतिहास के पन्नों में अक्सर हम भगतसिंह की फांसी की बात करते हैं, लेकिन उस साथी को भूल जाते हैं जिसने भगत सिंह की बाहों में दम तोड़ा था। आज हम बात कर रहे हैं ‘यतींद्र नाथ दास’ की, जिन्हें दुनिया ‘जतिन दा’ के नाम से जानती थी। पेशे से वो बम बनाने में माहिर थे, लेकिन उनका हथियार बना उनका अपना शरीर।🔸️वो चाहते तो माफी मांग सकते थे, खाना खा सकते थे। लेकिन मांग सिर्फ एक थी – “भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ जानवरों जैसा सलूक बंद करो।” अंग्रेजों को लगा कि भूख इसे तोड़ देगी। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह शरीर मिट्टी का नहीं, फौलाद का बना है।🔹️जब जतिन दा की हालत बिगड़ने लगी, तो अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। जेल के डॉक्टर और सिपाहियों ने उन्हें दबोच लिया। नाक से नली डाली। दर्द से वो चीखते रहे, लेकिन उनका संकल्प नहीं डिगा। उनकी शहादत की खबर जब बाहर आई, तो पूरा देश रो पड़ा था।कहा जाता है कि जब उनका शव लाहौर से कलकत्ता ले जाया जा रहा था, तो हर स्टेशन पर हजारों लोग फूल लेकर खड़े थे। कलकत्ता में उनकी अंतिम यात्रा में 6 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए।🔸️सुभाष चंद्र बोस ने खुद उनके पार्थिवशरीर को कंधा दिया था। लेकिन आज? आज कितने लोग उस 63 दिन की तपस्या को याद करते हैं?🔹️मरते वक्त जतिनदा ने कहा था, “मैं कोई साधु नहीं हूँ, मैं बस एक साधारण इंसान हूँ जो अपने देश की गरिमा के लिए मरना चाहता है।” आजादी चरखे से आई या बिना खड्ग-ढाल के, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन यह सच है कि आजादी की नींव में जतिन दा जैसे नौजवानों की गल चुकी हड्डियां गड़ी हैं।🔸️हमें यह आजादी खैरात में नहीं मिली, इसके लिए किसी ने अपनी जवानी के 63 दिन भूखे रहकर कुर्बान किए हैं। हर भारतीय का कर्तव्य है कि वो जाने कि जिस हवा में वो सांस ले रहा है, उसकी कीमत क्या थी।🚩 इस जानकारी को साझा करें ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि असली ‘हीरो’ कौन थे।यह पोस्ट केवल उन भूले-बिसरे नायकों को नमन करने के लिए है।।👉 यह पोस्ट केवल जानकारी साझा करने के उद्देश्य से है। इसका किसी भी व्यक्ति, धर्म या आस्था की भावनाओं को ठेस पहुँचाने से कोई संबंध नहीं है। इसमें दिए गए तथ्य आज भी इंटरनेट और विभिन्न विश्वसनीय वेबसाइटों पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। हम सभी धर्मों जातियों और आस्थाओं का सम्मान करते हैं। यह पोस्ट केवल सूचना देने के उद्देश्य से साझा की गई है, न कि किसी की भावनाओं को आहत करने के लिए।🚩यह जानकारी हमने अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त की है, जैसे चैटजीपीटी, इंटरनेट और गूगल। यह जानकारी आज भी विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध है, जिसे आप स्वयं सर्च करके देख सकते हैं।#Renumourya #fybpost #politics #socialmedia #fybviralpost#historyfacts #HistoryUnfolded #worldhistory #history #world_history_and_muslim_history

