
इस वक्त दुनिया शीत युद्ध के समय की तरह दो हिस्सों में बंटी हुई नजर आ रही है. एक तरफ अमेरिका है और दूसरी ओर रूस. मामला यूक्रेन युद्ध से शुरू हुआ था लेकिन अब ये वैश्विक धुरियों में बंट गया है. जो देश रूस से व्यापार बढ़ा रहा है, उसे अमेरिका के ग्रुप से निकलना पड़ रहा है. पाकिस्तान जहां अमेरिका के साथ साठ-गांठ बिठाने में जुटा है, वहीं खुद को इस्लामिक देशों का खलीफा समझने वाला तुर्की अमेरिका की एक घुड़की से लाइन पर आ गया है.
तुर्की वो देश है, जो पहले रूस से तेल भी ले रहा था और रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच मध्यस्थ की भूमिका भी निभा रहा था. हालांकि दोनों देशों के बीच बात नहीं बनने पर उसने किनारा कर लिया. वहीं अमेरिका की रूस से व्यापार करने वाले देशों पर 500 फीसदी टैरिफ की धमकी के बाद तुर्की अपने कदम पीछे हटा लिए. यहां तक कि अमेरिका की ओर से उसे मिलने वाले F-35 फाइटर्स की डील भी अटक गई, जिसके बाद वो ब्रिटेन से यूरो फाइटर्स खरीद रहा है.
क्या अमेरिका की धमकी से तुर्की हुआ पीछे?
तुर्की रूसी तेल के बड़े खरीदारों में से एक था. हालांकि उसने जनवरी में यूरल्स का आयात घटाकर करीब 250,000 बैरल प्रतिदिन कर दिया, जबकि 2025 में यह औसतन 275,000 बैरल प्रतिदिन था. जून में ये पिछले साल रिकॉर्ड 400,000 बैरल प्रतिदिन था. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक एक व्यापारी ने बताया कि हाल ही में भारतीय और तुर्की खरीदारों ने खरीद कम की है, तो कुछ रूसी यूरल्स की खेप चीन चली गई. व्यापारियों ने बताया तुर्की में यूरल्स की मांग कम हो गई. इसके पीछे वजह वही एक्ट है, जिसके तहत अमेरिका उन देशों पर 500 फीसदी टैरिफ की धमकी दे रहा है, जो रूस से व्यापार करते हैं. चूंकि भारत-चीन के साथ तुर्की भी रूसी तेल आयात करता था, ऐसे में उसने सबसे पहले अपने कदम पीछे खींचे हैं. वह ट्रंप को नाराज नहीं करना चाहता, खासकर ऐसे समय में जब उसे अमेरिकी F-35 फाइटर जेट की जरूरत है.
