
इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि यह खतरा नया नहीं था. CAG (कैग) की रिपोर्ट सालों पहले ही चेतावनी दे चुकी थी कि मध्यप्रदेश के शहरों में पीने का पानी लोगों की सेहत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है. बावजूद इसके, न तो निगरानी सुधरी और न ही सिस्टम में कोई ठोस सुधार हुआ.
5.45 लाख मरीज, फिर भी नहीं चेता सिस्टम
Comptroller and Auditor General of India की जनरल और सोशल सेक्टर पर आधारित रिपोर्ट (31 मार्च 2018 तक) के मुताबिक, 2013 से 2018 के बीच सिर्फ भोपाल और इंदौर में 5.45 लाख से ज्यादा पानी से होने वाली बीमारियों के मामले दर्ज हुए थे. रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि नगर निगमों द्वारा सप्लाई किया जा रहा पानी दूषित हो सकता है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता.
सैंपलिंग में निकला खतरनाक सच
जमीनी हालात जानने के लिए CAG ने अगस्त–सितंबर 2018 में भोपाल और इंदौर नगर निगम के साथ मिलकर संयुक्त जांच की. कुल 54 पानी के सैंपल लिए गए, जिन्हें स्टेट रिसर्च लैब, भोपाल में टेस्ट किया गया. भोपाल में कई सैंपल्स में गंदलापन (Turbidity) तय मानकों से ज्यादा पाया गया, वहीं फीकल कोलीफॉर्म, जो शून्य होना चाहिए, वह मौजूद मिला. इंदौर में हालत और खराब थी यहां फीकल कोलीफॉर्म की मात्रा 40 से 140 तक पाई गई, जो बेहद खतरनाक मानी जाती है.
