
इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दिसंबर के अंत में गंदे पानी पीने से हुई मौतों को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है. हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने मंगलवार को राज्य सरकार की मौतों की ऑडिट रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे आंखों में धूल झोंकने वाली रिपोर्ट बताया. कोर्ट ने खासतौर पर वर्बल ऑटोप्सी (verbal autopsy) शब्द पर तीखे सवाल किए. हाईकोर्ट ने पूछा कि क्या यह कोई मान्य चिकित्सकीय या वैज्ञानिक टर्म है या सरकार ने खुद गढ़ लिया है? इस घटना में कम से कम 23 मौतें रिपोर्ट हुई थी.
वर्बल ऑटोप्सी क्या है?
वर्बल ऑटोप्सी एक स्थापित सार्वजनिक स्वास्थ्य विधि है, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने मान्यता दी है. यह उन जगहों पर मौत के कारणों का पता लगाने के लिए इस्तेमाल होती है जहां पारंपरिक पोस्टमार्टम या चिकित्सकीय प्रमाणीकरण संभव नहीं होता. जैसे ग्रामीण इलाके, कम संसाधन वाले देश या जहां मौत घर पर होती है. इसमें मृतक के परिवार के सदस्यों, देखभाल करने वालों या परिचितों से साक्षात्कार लिया जाता है. सवालों के जरिए लक्षण, बीमारी का इतिहास, मौत से पहले की परिस्थितियां और घटनाक्रम इकट्ठा किए जाते हैं. फिर इस जानकारी को मानकीकृत प्रश्नावली के आधार पर विश्लेषित कर संभावित कारण तय किया जाता है.
यह शारीरिक ऑटोप्सी नहीं है, बल्कि मौखिक जांच है. WHO इसे कमजोर सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम वाले क्षेत्रों में मौतों के कारणों का अनुमान लगाने के लिए उपयोगी मानता है. भारत में भी मिलियन डेथ स्टडी जैसी बड़ी परियोजनाओं में इसका इस्तेमाल हुआ है. हालांकि, यह संभावित कारण देती है, न कि 100 फीसदी निश्चित कारण बताती है.
