
साउथ एशिया की जियोपॉलिटिक्स में इन दिनों गजब हो रहा है. एक तरफ ईरान, जो भारत के लिए मध्य एशिया का प्रवेश द्वार है, पिछले तीन वर्षों के सबसे भीषण गृहयुद्ध जैसे हालात का सामना कर रहा है. वहां मस्जिदें जल रही हैं और सड़कों पर मौत का तांडव है. वहीं दूसरी तरफ काबुल के सन्नाटे में भारत ने एक बड़ी कूटनीतिक बाजी पलट दी है. तालिबान शासित अफगानिस्तान ने नूर अहमद नूर को नई दिल्ली में अपना राजदूत नियुक्त किया है. जवाब में, भारत ने भी काबुल में अपने दूतावास को पूरी तरह सक्रिय करते हुए करण यादव को अपना दूत बनाकर भेजा है. यह खबर सामान्य लग सकती है, लेकिन जब आप इसे ईरान में ट्रंप की धमकियों और ‘रिजीम चेंज’ की आहट के बीच रखकर देखते हैं, तो यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा दांव नजर आता है.
अगस्त 2021 में जब काबुल पर तालिबान का कब्जा हुआ, तो दुनिया ने माना कि भारत का खेल अब खत्म हो चुका है. पाकिस्तान जश्न मना रहा था कि उसे स्ट्रैटेजिक डेप्थ मिल गई. लेकिन 2026 आते-आते बाजी पलट गई है. नूर अहमद नूर का नई दिल्ली आना और करण यादव का काबुल में कमान संभालना, पूरा खेल बदलने जैसा है. भारत ने अभी तक तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन फुल डिप्लोमेटिक मिशन खोल दिया है. इसका सीधा मतलब है कि भारत अब आदर्शवाद के लिए अपने राष्ट्रहितों की बलि नहीं देगा. तालिबान चाहता है कि भारत वापस आए, और भारत को वहां चीन और पाकिस्तान की खाली छोड़ी हुई जगह भरनी है. सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यह कदम काबुल में चीन और पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के उद्देश्य से उठाया गया है.
