
ईरान एक बार फिर उबल रहा है. तेहरान की सड़कों से लेकर कुर्दिस्तान के पहाड़ों तक, ‘तानाशाही मुर्दाबाद’ के नारे गूंज रहे हैं. लेकिन यह पहली बार नहीं है. पिछले 17 वर्षों में ईरान कई बार इस दोराहे पर खड़ा हुआ है. हर बार जब जनता सड़कों पर उतरती है, तो दुनिया को लगता है कि शायद इस बार इस्लामी गणराज्य की नींव हिल जाएगी. लेकिन जैसे ही धूल छंटती है, अयातुल्ला का शासन और भी क्रूरता के साथ अपनी जगह पर कायम नजर आता है. आज वही पुराने सवाल फिर से फिजाओं में तैर रहे हैं कि आखिर ईरानी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए क्या करना होगा? हम कैसे जानेंगे कि हम उस निर्णायक मोड़ पर पहुंच गए हैं जहां से वापसी मुमकिन नहीं है? और सबसे बड़ा सवाल कि इतनी कोशिशों के बावजूद हर बार नाकामी ही क्यों हाथ लगती है?
