
दुनिया किसी का इंतज़ार नहीं करती और न ही हमें करना चाहिए. यह शब्द किसी क्रांतिकारी के नहीं बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ के मुखिया एंटोनियो गुटेरेस के हैं. दशकों से भारत जिस बदलाव की मांग दुनिया के हर मंच से चीख-चीख कर कर रहा था, आज उसी सुर में यूएन चीफ भी सुर मिलाते नजर आ रहे हैं. न्यूयॉर्क के गलियारों में अब यह सुगबुगाहट तेज हो गई है कि जो सुरक्षा परिषद (UNSC) दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी थी, क्या वह आज की हकीकत को संभालने के काबिल है? गुटेरेस ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि जो आज विशेषाधिकारों से चिपके रहेंगे, उन्हें कल इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. भारत सालों से कह रहा है कि 1.4 अरब की आबादी वाले देश को बाहर रखकर दुनिया की सुरक्षा का फैसला लेना बेमानी है. अब जब यूएन की प्रासंगिकता पर ही सवाल उठने लगे, तब जाकर नेतृत्व को यह बदलाव ‘अनिवार्य’ लगने लगा है.
बदलाव की मजबूरी या भारत की बढ़ती ताकत?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का वर्तमान ढांचा आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं से कोसों दूर है. इसमें शामिल पांच स्थायी सदस्य (P5) वीटो पावर का इस्तेमाल अक्सर अपने निजी हितों के लिए करते हैं. भारत ने बार-बार वैश्विक मंचों पर यह तर्क दिया है कि 1945 का ढांचा 2026 की चुनौतियों का मुकाबला नहीं कर सकता. रूस-यूक्रेन युद्ध हो या मध्य-पूर्व का संकट, सुरक्षा परिषद की विफलता ने इसके अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है. अब यूएन चीफ का यह बयान कि ‘सुधार अनिवार्य है’, असल में भारत की उस कूटनीतिक जीत पर मुहर है जिसे नई दिल्ली सालों से आगे बढ़ा रही है.
