
इंसानियत कहा जिंदा है शहर या गांव के लोगों में? यूपी में हुए 2 बड़े हादसों ने इस सवाल का जवाब साफ किया है. एक तरफ नोएडा में इंजीनियर युवराज मेहता 2 घंटे तक दलदल भरे पानी में फंसा रहा और लोग भीड़ का रूप लेकर केवल उसे देखते रहे. वो रोता रहा. चिल्लाता रहा. मदद के लिए गिड़गिड़ाता रहा, मगर कोई भी उसे बचाने के लिए आगे नहीं आया. इसमें पुलिस और आपात सेवा के अधिकारी भी मौजूद थे. जब उसकी मौत हो गई तो नोएडा-दिल्ली से लेकर कई शहरों के लोगों ने सरकार से लेकर प्रशासन तक को घेरा. मगर उसकी मौत के असली जिम्मेदार कौन? यह सवाल का जवाब आपको दूसरी घटना दे देगी. इंजीनियर हादसे के कुछ ही दिन बाद प्रयागराज के एक गांव में तालाब के बीच में एक ट्रेनी एयरक्रॉफ्ट जा गिरा जिसमें 2 युवा पायलट फंसे थे, जिन्हें बचाने सरकार या प्रशासन से पहले वहां मौजूद ग्रामीण तालाब में कूद गए. न केवल उन्हें सकुशल बचाया बल्कि अस्पताल भी ले गए.
इन दोनों घटनाओं से साफ हो गया कि आज भी गांव के लोगों में इंसानियत जिंदा है. इंजीनियर युवराज मेहता के साथ यह घटना अगर किसी ग्रामीण इलाके में घटी होती तो हो सकता है आज वह जिंदा होता. जब नोएडा के सेक्टर 150 में वह पानी के दलदल में फंसा था तो लोगों से मदद की गुहार लगा रहा था मगर पुलिस प्रशासन से लेकर आमजन कोई उसे बचाने के लिए आगे इसलिए नहीं बढ़ा क्योंकि पानी ठंडा था और सरिया निकली हुई थी.
