
24 जनवरी 1966 की सर्द सुबह… यूरोप की बर्फीली चोटियों के ऊपर आसमान में एयर इंडिया की फ्लाइट 101 ‘कंचनजंघा’ अपने तय रास्ते पर बढ़ रही थी. अंदर बैठे थे भारत के सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक और परमाणु कार्यक्रम के जनक होमी जहांगीर भाभा. कुछ ही मिनटों में यह उड़ान इतिहास की सबसे रहस्यमयी त्रासदियों में बदल गई.
जिनेवा में लैंड करने से पहले विमान फ्रेंच आल्प्स की मॉउंट ब्लांक पर्वतमाला से टकरा गया. फ्रेंच आल्प्स में 4,677 मीटर की ऊंचाई पर हुआ यह हादसा इतना भयानक था कि विमान में सवार सभी 106 यात्री और 11 क्रू मेंबर की मौत हो गई. इस हादसे में भारत ने सिर्फ 117 जिंदगियां नहीं खोईं, उसने अपने सबसे बड़े वैज्ञानिक, परमाणु कार्यक्रम के जनक टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) के संस्थापक और परमाणु ऊर्जा आयोग के चेयरमैन होमी जहांगीर भाभा को खो दिया.
भाभा तब सिर्फ 56 साल के थे. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसे ‘राष्ट्र के लिए भयानक झटका’ और ‘व्यक्तिगत क्षति’ कहा. महज दो हफ्ते पहले लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में रहस्यमयी मौत हुई थी. दो हफ्ते में दो बड़े धरोहरों को खोना भारत के लिए यह दुखद संयोग था.
