
महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे की गोली से 30 जनवरी 1948 को हुई. इसके बाद दिल्ली में ही गांधीजी का अंतिम संस्कार पूरे राष्ट्रीय सम्मान के साथ किया गया. तब उनकी अस्थियों को विसर्जित करने का काम भी किया गया लेकिन 90 के दशक में फिर गांधीजी की अस्थियों को लेकर एक ऐसा राज खुला कि हर कोई हैरान रह गया. तब 47 सालों बाद फिर से उनकी अस्थियों का विसर्जन रीति रिवाज के साथ प्रयागराज के संगम पर ले जाकर कर किया गया.
90 के दशक में अचानक देश में एक तूफान उठ खड़ा हुआ. पता लगा कि महात्मा गांधी की अस्थियां ओडिशा के एक बैंक लॉकर में छिपाकर रखी हुई हैं. 40 साल से वो एक लकड़ी के डिब्बे में पड़ी हैं. ओडिशा के कुछ अखबारों ने जब इसकी खबरें छपीं तो सवाल उठने लगे कि ऐसा किसने किया. इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि ये सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
ये 90 के दशक के बीच की बात है. अचानक ना जाने कैसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अंदरूनी सूत्रों ने स्थानीय मीडिया को ये सूचना लीक की कि उनके बैंक में पिछले 40 सालों से महात्मा गांधी की अस्थियां एक लॉकर में छिपाकर रखी हैं. खबर छपते ही तीव्र प्रतिक्रियाएं होने लगीं. किसी को समझ में नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ है. किसने ऐसा किया. ऐसा करने के पीछे मकसद क्या था.
